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Showing posts from June, 2014

यादों की नगरी

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यह फोटो किसी रंगीन शाम का नही, बल्कि बीते हुए उन पलों के झरोखा का है, जिनके झोके आज भी मन को उदास कर देतें हैं। जिससे हम लड़ तो लेते हैं लेकिन उसका दर्द इन कोमल आंखों से छलक आता ह...

"बहोत अजीब है हम"

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बहोत अजीब हो गए हैं हम कुछ गमलों में चमकते फूलों की रंगीन पंखुड़ियों को देख कर समझते हैं कि हमारा पर्यावरण सिर्फ और सिर्फ शुद्धता बरसा रहा है ! आफिस गार्ड की कड़क यूनिफार्म से अंदाजा आर्थिक अवस्था का लगाते हैं पर, हमें जरा भी गुमान तक नहीं होता कि उसका बेटा निकाल दिया गया स्कूल से फीस नहीं दिये जाने के वजह से ! फेसबूक पर चंद मुसकुराते फोटोज पर लाइक बटन दबा कर, कह उठते हैं 'कितना खुशहाल और सम्पन्न परिवार है आपका' फेसबूक पर चहक रही स्त्री.. कितना प्रयास करती है पति के थप्पड़ से आंखो के नीचे बने नीले निशान छुपा ही ले जाती है.. हमे कहाँ दिखते हैं भला.. 200 ग्राम सेब.. साथ में चिप्स / बिसलरी खरीद कर, 'महंगाई बढ़ गई है,' समझने लगते हैं, अर्थ व्यवस्था पर बौद्धिकता छांटते हैं पर नहीं दिखती उस दुकानदार की ढीली होती जाती पैंट, भूख के वजह से ..... बहुत जोड़ तोड़ कर स्पाइसजेट का सुपर इकोनोमी टिकट हासिल करते हैं और फिर, अगले छह साल तक हवाओं मे उड़ते हुए बादलों की ओंट से खुद को हिलता महसूस करते हैं चलो कोई बात नहीं कुछ कल्पनाशीलता.. बेवजह ही.. मन में ही चित्र खी...

अबकी बार क्या होगा यार !!

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पाकिट से सब पैसा झाड़ ! अबकी बार ऐसी सरकार !! चुकता कर दे सभी उधार ! अबकी बार ऐसी सरकार !!  गुंडे मवाली सिपहसालार ! आगई ऐसी सरकार !! खूब करेंगे भ्रष्टाचार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! इसको उसको गोली मार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! बहन-बेटियां होशियार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! तेज करो सारे हथियार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! पेड रिपोर्टर पालतू अखबार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! प्याज़ मिलेगी लोन पे यार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! चोरी हो गए कटहल चार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! ट्रेन से चलना हुआ दुश्वार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! तिलक तराजू और तलवार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! पूंजीपतियों में हुआ करार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! अडानी के प्लेन पर बीजेपी सवार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! दुल्हन देश अंबानी भरतार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! बिकेगा सबका घर-बार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! चमकेगी खूनी तलवार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! मोहसिन बेचारा दिया गया मार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! दंगा और बलात्कार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! मिलेगी पेड़ो पे लाशे चार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! मिले बलात्कारियो को उपहार ! अबकी बार ऐसी सरकार !! ...

सियासत एक नजरिया

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मंदिर की ख़ामोशी देखी मस्जिद भी खामोश थी नफरत का बाजार सजा था और सियासत चोर थी सड़कों पर दरकार खड़ी थी महलों में सरकार गलियों में लाशों की बस्ती चौराहों पर आस अभिलाषा बस सिसक रही थी कहीं रात बस शोर थी नफरत का बाजार सजा था ,और सियासत चोर थी  ख़ुशी बंद पन्नों पर अटकी नजर पड़ी तो झूमा झटकी आटा दाल नमक और शक्कर जीवन का हर खेल था चक्कर असलाहों की धमक सुबह ले महज रात भर रोता था मुरदों  की ढेरी पर सूरज चमक फलक में खोता था मटमैली जीने की चाहत जीवन पर कमजोर थी नफरत का बाजार सजा था, और सियासत चोर थी  सत्याग्रह खंजर करते थे गूंगे थे चीत्कारते पूर्वाग्रह से सत्ता दुसित बहरी हुई पुकार से क्रंदन की बोली लगती थी अभिनन्दन की बेला  में नीम चढ़ी शक्कर के ऊपरगुड जा बसी करेला में कडवी साँसों की गर्माहट फ़ैल रही पुरजोर थी नफरत का बाजार सजा था, और सियासत चोर थी  पूरब में बंटवारे गूंजे मध्य में थी क्रांति उत्तर में ध्वज जलते देखा दक्षिण में थी भ्रान्ति महलों में बलिदान समर था, डाकू चढ़ते पालकी...

गुज़ारिश

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कहीं है आग का दरिया, कहीं शोलों कि बारिश है समंदर कि तपिश समझों, ये मौजों कि गुजारिश है घने बादल बरसते हैं कहीं पर दिल तरसते हैं कहीं मदहोशियों कि कुछ अदायें याद आती हैं कहीं सरगोशियाँ छुप के, वफाओं को हंसाती  हैं कहीं पैगाम आँखों से, दिलों को चीर कर खोती कहीं धड़कन कि दस्तक पर, जवानी रात भर रोती छलक जब जाम है चढ़ती, सुहानी बंद गलियों में कसम से आग लग जाती, यहाँ कमसिन कलियों में जरा उस आग से कह दो, यहाँ मौसम कि साजिश है समंदर कि तपिश समझों, ये मौजों कि गुजारिश है यहाँ  बातों के रेलों से, शहर वीरान सजते हैं तबेले ज़िंदगी के जब , झमेलों से गुजरते हैं शहर कि सुन्न गलियों में, मकां  पैगाम देता है खुली छत के झरोखों से, ये मंजर आम होता है शिफा-ए -मौत से कुछ ज़िंदगी करती सिफारिश है समंदर कि तपिश समझो, ये मौजों कि गुजारिश है अभी वीरानियों पे कुछ, दीवारें दर्प करती थीं कफ़न ढांचों पे लिपटा कर, बदन को गर्म करती थीं सिहर कर चांदनी, मजमूनियत पर मुस्कराती थी शहर शमशान में सोते हुए एक गीत गाती  थी रवानी ज़िंदगी की, हर कदम गुलशन सजाती ...