कहीं है आग का दरिया, कहीं शोलों कि बारिश है समंदर कि तपिश समझों, ये मौजों कि गुजारिश है घने बादल बरसते हैं कहीं पर दिल तरसते हैं कहीं मदहोशियों कि कुछ अदायें याद आती हैं कहीं सरगोशियाँ छुप के, वफाओं को हंसाती हैं कहीं पैगाम आँखों से, दिलों को चीर कर खोती कहीं धड़कन कि दस्तक पर, जवानी रात भर रोती छलक जब जाम है चढ़ती, सुहानी बंद गलियों में कसम से आग लग जाती, यहाँ कमसिन कलियों में जरा उस आग से कह दो, यहाँ मौसम कि साजिश है समंदर कि तपिश समझों, ये मौजों कि गुजारिश है यहाँ बातों के रेलों से, शहर वीरान सजते हैं तबेले ज़िंदगी के जब , झमेलों से गुजरते हैं शहर कि सुन्न गलियों में, मकां पैगाम देता है खुली छत के झरोखों से, ये मंजर आम होता है शिफा-ए -मौत से कुछ ज़िंदगी करती सिफारिश है समंदर कि तपिश समझो, ये मौजों कि गुजारिश है अभी वीरानियों पे कुछ, दीवारें दर्प करती थीं कफ़न ढांचों पे लिपटा कर, बदन को गर्म करती थीं सिहर कर चांदनी, मजमूनियत पर मुस्कराती थी शहर शमशान में सोते हुए एक गीत गाती थी रवानी ज़िंदगी की, हर कदम गुलशन सजाती ...