"बहोत अजीब है हम"
बहोत अजीब हो गए हैं हम
कुछ गमलों में चमकते फूलों की
रंगीन पंखुड़ियों को देख कर
समझते हैं कि हमारा पर्यावरण
सिर्फ और सिर्फ शुद्धता बरसा रहा है !
आफिस गार्ड की कड़क यूनिफार्म से
अंदाजा आर्थिक अवस्था का लगाते हैं
पर, हमें जरा भी गुमान तक नहीं होता
कि उसका बेटा निकाल दिया गया स्कूल से फीस नहीं दिये जाने के वजह से !
फेसबूक पर चंद मुसकुराते फोटोज पर
लाइक बटन दबा कर, कह उठते हैं
'कितना खुशहाल और सम्पन्न परिवार है आपका'
फेसबूक पर चहक रही स्त्री.. कितना प्रयास करती है
पति के थप्पड़ से आंखो के नीचे बने नीले निशान छुपा ही ले जाती है.. हमे कहाँ दिखते हैं भला..
200 ग्राम सेब.. साथ में चिप्स / बिसलरी
खरीद कर, 'महंगाई बढ़ गई है,'
समझने लगते हैं,
अर्थ व्यवस्था पर बौद्धिकता छांटते हैं
पर नहीं दिखती उस दुकानदार की
ढीली होती जाती पैंट, भूख के वजह से .....
बहुत जोड़ तोड़ कर स्पाइसजेट का
सुपर इकोनोमी टिकट हासिल करते हैं
और फिर, अगले छह साल तक
हवाओं मे उड़ते हुए बादलों की ओंट से
खुद को हिलता महसूस करते हैं
चलो कोई बात नहीं
कुछ कल्पनाशीलता..
बेवजह ही..
मन में ही चित्र खींच कर
जिंदगी के पन्नो पर अतिरेक रंग
भरने का नाटक तो करते हैं हम !
आखिर जिंदगी जीना भी तो जरूरी है !!
आखिर ज़िन्दगी जरुरी है चाहे जैसी भी!!
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