गुज़ारिश


कहीं है आग का दरिया, कहीं शोलों कि बारिश है

समंदर कि तपिश समझों, ये मौजों कि गुजारिश है

घने बादल बरसते हैं कहीं पर दिल तरसते हैं

कहीं मदहोशियों कि कुछ अदायें याद आती हैं

कहीं सरगोशियाँ छुप के, वफाओं को हंसाती  हैं


कहीं पैगाम आँखों से, दिलों को चीर कर खोती

कहीं धड़कन कि दस्तक पर, जवानी रात भर रोती

छलक जब जाम है चढ़ती, सुहानी बंद गलियों में

कसम से आग लग जाती, यहाँ कमसिन कलियों में

जरा उस आग से कह दो, यहाँ मौसम कि साजिश है

समंदर कि तपिश समझों, ये मौजों कि गुजारिश है

यहाँ  बातों के रेलों से, शहर वीरान सजते हैं

तबेले ज़िंदगी के जब , झमेलों से गुजरते हैं

शहर कि सुन्न गलियों में, मकां  पैगाम देता है

खुली छत के झरोखों से, ये मंजर आम होता है

शिफा-ए -मौत से कुछ ज़िंदगी करती सिफारिश है

समंदर कि तपिश समझो, ये मौजों कि गुजारिश है

अभी वीरानियों पे कुछ, दीवारें दर्प करती थीं

कफ़न ढांचों पे लिपटा कर, बदन को गर्म करती थीं

सिहर कर चांदनी, मजमूनियत पर मुस्कराती थी

शहर शमशान में सोते हुए एक गीत गाती  थी

रवानी ज़िंदगी की, हर कदम गुलशन सजाती है

मुहब्बत झील सी, बस हर तरफ किस्सा सुनाती है

उसी गुलशन कि अर्ज़ी से, फलक लिखता तवारीख है

समंदर कि तपिश समझो, ये मौसम कि गुजारिश है



धधकता कुछ दबा सा आज, सीने में दहकता है

ढली हुई साँझ के उस छोर पर, सूरज चमकता है

सितारे टूट कर आँगन में, अब भी रोज गिरते हैं

कसक छोटे से दामन कि, फलक तक साथ फिरते हैं

मगर रुशवाईयां ही हर कदम, गुलजार होती है

उजड़ कर आज ये बस्ती, शरम से तार होती है

उसी बस्ती कि सरहद पर, सबेरा छुप के रोता है

अँधेरा आज गलियों में दुबक कर खूब सोता है

सुबकती हर तरफ बस आज अरमानों कि डोली है

कहीं माथे चढ़ी है राख, बस करती ठिठोली है

सजी इस आरती में बदनसीबी, एक अदा सी है

  • समंदर कि तपिश समझो, ये मौजों कि गुजारिश है



Comments

  1. बहुत खूब नयी शुरुआत |

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  2. फैसला अफजाई के लिए बहोत बहोत धन्यवाद

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  3. बहुत खूब नयी शुरुआत सुन्दर लिखा है बधाई भाई शादाब जी

    ...ब्लॉगजगत में मैं संजय भास्कर आपका स्वागत करता हूँ !


    संजय भास्कर
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in

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  4. सर आपको बहोत बहोत धन्यवाद

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